हाथ-पैर सुन्‍न पड़ जाएं तो अपनाएं ये घरेलू उपचार

अगर हाथ पैरों में जन्‍नाहट होती है तो अपने आहार में ढेर सारे विटामिन बी, बी6 और बी12 को शामिल करें। इनके कमी से हाथ, पैरों, बाजुओं और उंगलियों में सुन्‍नता पैदा हो जाती है।

आपको अपने आहार में अंडे, अवाकाडो, मीट, केला, बींस, मछली, ओटमील, दूध, चीज़, दही, मेवे, बीज और फल शामिल करने चाहिये। आप चाहें तो vitamin B-complex supplement भी दिन में दो बार खा सकते हैं।हरी पत्‍तेदार सब्‍जियां, मेवे, बीज, ओटमील, पीनट बटर, ठंडे पानी की मछलियां, सोया बीन, अवाकाडो, केला, डार्क चॉकलेट और लो फैट दही आदि खानी चाहिये।

आप रोजाना मैग्‍नीशियम 350 एम जी की सप्‍पलीमेंट भी ले सकती हैं। पर इस बारे में डॉक्‍टर से जरुर बात कर लें।हाथ और पैरों के खराब ब्‍लड सर्कुलेशन से ऐसा होता है। इसलिये उस प्रभावित हिस्‍से को ऊपर की ओर उठाइये जिससे वह नार्मल हो सके। इससे सुन्‍न वाला हिस्‍सा ठीक हो जाएगा। आप अपने प्रभावित हिस्‍से को तकिये पर ऊंचा कर के भी लेट सकते हैं।

सबसे पहले प्रभावित जगह पर गरम पानी की बोतल का सेंक रखें। इससे वहां की ब्‍लड सप्‍पलाई बढ़ जाएगी। इससे मासपेशियां और नसें रिलैक्‍स होंगी। एक साफ कपड़े को गरम पानी में 5 मिनट के लिये भिगोएं और फिर उससे प्रभावित जगह को सेंके। आप चाहें तो गरम पानी से स्‍नान भी कर सकती हैं।

व्‍यायाम करने से शरीर में ब्‍लड र्स्‍कुलेशन होता है और वहां पर ऑक्‍सीजन की मात्रा बढ़ती है। रोजाना हाथ और पैरों का 15 मिनट व्‍यायाम करना चाहिये। इसके अलावा हफ्ते में 5 दिन के लिये 30 मिनट एरोबिक्‍स करें, जिससे आप हमेशा स्‍वस्‍थ बने रहें।

आसानी से वज़न घटाने के लिए खाएं कड़ी पत्ता


1. आपको पता नहीं कड़ी पत्ता खाने से त्वचा, बाल और स्वास्थ्य को कितने फायदे मिलते हैं!

2. कड़ी पत्ता ब्लड-शुगर लेवल को कम करने में सहायता करता है जो मधुमेह रोगियों के लिए भी बहुत फायदेमंद साबित होता है।

3. यहाँ तक लीवर को स्वस्थ रखने के लिए कड़ी पत्ता का जूस पिया जाता है,जो लीवर के लिए लाभकारी होता है। यह तो कड़ी पत्ते के फायदों के बारे में बता रहे हैं लेकिन

4. आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि कड़ी पत्ता से वज़न को भी आसानी से घटाया जा सकता है। इन पत्तों के सेवन से आपके शरीर का जमा फैट निकल जाता है और इसमें जो फाइबर होता है वह शरीर से विषाक्त पदार्थों या टॉक्सिन को निकाल देता है। इसका रेचक (laxative) गुण खाने को जल्दी हजम करवाता है, विशेषकर जब आप बदहजमी महसूस करते हैं।

बंद माहवारी को चालू करने के घरेलु उपाय



मासिक धर्म स्त्री में होने वाली एक स्वाभाविक प्रक्रिया है| किसी कन्या को जो सबसे पहली बार ऋतूस्राव होता है उसे रजोदर्शन कहते हैं यह मासिक धर्म हर एक 28 दिन के अंतराल से लगभग 45 से 50 वर्ष की उम्र तक बना रहता है ! यह स्राव 3 दिनों से लेकर 6 दिनों के समय के लिए होता है ! माहवारी या हत्रल गर्भाशय से आता है एवं योनी मार्ग से बहार निकलता है यह बहुत न गाड़ा और न बहुत पतला है इसका रंग कुछ कालिमा लिए हुए लाल है ! इससे पता चलता है की कन्या अब युवा हो गयी है !

लक्षण :- 
महिलाओं में या युवा लड़कियों में आमतौर पर रजोप्रव्रती के समय पेट में अत्यधिक दर्द होना मासिक धर्म का नियमित न होना एवं कभी जल्दी या कभी देर से आना और खून के थक्कों के साथ आना ऋतुस्राव का अनियमित होना कहलाता है ! ऐसी स्थिति में पुरुष अगर सम्भोग करता है तो उसे संक्रमण होने की संभावना रहती है इसीलिए ऋतुस्राव के दौरान कभी सेक्स नहीं करना चाहिए तथा मासिक धर्म का दर्द युवतियों की आम समस्या रहती है ! जिसमे खासतौर से बीज वाहिनी एवं अंडाशय की विक्रति के साथ साथ मलावरोध की भी शिकायत रहती है महिलाओं को अनेक रोगों के साथ कमर में विकराल पीड़ा सर में दर्द उलटी आदि लक्षण होते है !

कारण :-
शरीर में बहुत ज्यादा आलस्य, खून की कमी, मैथुन दोष, माहवारी के समय ठंडी चीजों का सेवन, ठंड लग जाना, पानी में देर तक भीगना, व्यर्थ में इधर-उधर भ्रमण करना, शोक, क्रोध, दुःख, मानसिक उद्वेग, तथा मासिक धर्म के समय खाने-पीने में असावधानी – इन सभी कारणों से मासिक धर्म रुक जाता है या समय से नहीं होता|

पहचान :-
गर्भाशय के हिस्से में दर्द, भूख न लगना, वमन, कब्ज, स्तनों में दर्द, दूध कम निकलना, दिल धड़कना, सांस लेने में तकलीफ, कान
कान में तरफ-तरह की आवाजें सुनाई पड़ना, नींद न आना, दस्त लगना, पेट में दर्द, शरीर में जगह-जगह सूजन, मानसिक तनाव, हाथ, पैर व कमर में दर्द, स्वरभंग, थकावट, शरीर में दर्द आदि मासिक धर्म रुकने के लक्षण हैं|

नुस्खे :-
1. 3 ग्राम कालीमिर्च का चूर्ण शहद के साथ सेवन करने से माहवारी ठीक हो जाती है|

2. दूब का रस एक चम्मच की मात्रा में प्रतिदिन सुबह के समय पीने से रुकी माहवारी खुल जाती है|

3. कच्चे पपीते की सब्जी बनाकर कुछ दिनों तक खाने से मासिक धर्म खुलकर आने लगता है|

4. ग्वारपाठे का रस दो चम्मच की मात्रा में खाली पेट लगभग दो सप्ताह तक सेवन करें|

5. 10 ग्राम तिल, 2, ग्राम कालीमिर्च, दो नग छोटी पीपल तथा जरा-सी शक्कर-सबका काढ़ा बनाकर पीने से मासिक धर्म खुलकर आने लगता है|

6. 3 ग्राम तुलसी की जड़ का चूर्ण शहद के साथ सेवन करें|

7. 50 ग्राम सोंठ, 30 ग्राम गुड़, 5 ग्राम बायबिड़ंग तथा 5 ग्राम जौ – सबको मोटा-मोटा कूटकर दो कप पानी में औटाएं| जब पानी आधा कप रह जाए तो काढ़े का सेवन करें| रुका हुआ मासिक धर्म खुल जाएगा|

8. बरगद की जटा, मेथी और कलौंजी – सब 3-3 ग्राम की मात्रा में लेकर मोटा-मोटा कूट लें| फिर आधा किलो पानी में सब चीजें डालकर काढ़ा बनाएं| जब पानी आधा रह जाए तो छानकर शक्कर डालकर पी जाएं|

9. प्याज का सूप एक कप बनाएं| उसमें थोड़ा- सा गुड़ घोल लें| इस पीने से रुका हुआ मासिक धर्म खुल जाएगा|

10. दिन में तीन बार 2-2 ग्राम नामा गरम पानी से सेवन करना चाहिए| इससे मासिक धर्म खुल जाता है|

मासिक धर्म को नियमित करने के उपाय :-
जहाँ तक हो स्त्रीयों को भय, क्रोध, शोक, चिंता, तनाव, अत्यधिक सोने, अत्यधिक भूखे प्यासे रहने से बचना चाहिए एवं मासिक धर्म के दौरान सफाई आदि का ध्यान रखना जरूरी है !..

अगर आपको अपने सेक्स लाइफ को अच्छी तरह आनंद करनी हो तो .......





त्वचा में निखार लाता है लीची: 
लीची का नियमित सेवन से आपकी खूबसूरती को चार चाँद लग जाता है। इसमें पाए जाने वाले एंटीऑक्सीडेंट्स आपके एजिंग को धीमा कर देता है। और चेहरे में पाए जाने वाले छोटे छोटे धब्बे को भी कम करता है। लीची त्वचा के रंग में निखार लाने के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण फल है। इसके नियमित रूप से सेवन करने से बढ़ती उम्र का प्रभाव कम मालूम पड़ता है।

मोटापा घटाने के लिए लीची: 
आप लीची को वजन घटाने के लिए भी खा सकते हैं। इसमें फाइबर प्रचुर मात्रा में पाया जाता है जिसके खाने के बाद भूख बहुत देर तक नहीं लगती है। इस तरह से आप अपने वजन को कंट्रोल कर सकते हैं।

बेहतर सेक्स लाइफ के लिए लीची: 
अगर आपको अपने सेक्स लाइफ को अच्छी तरह आनंद करनी हो तो लीची का सेवन जरूर करें। लीची आपके सेक्स ड्राइव को बढ़ाता है और आपको पूर्ण संतुष्टि की ओर ले जाता है।

लीची ठंड से बचाता है :
इस फल के खाने से आपको ठंड में बहुत हद तक राहत मिलती है। इसमें विटामिन सी पाया जाता है जो आपके प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाता है और सर्दी -जुकाम से भी नजात दिलाता है।

 लीची हार्ट अटैक रोकता है:
 इसमें पोटैशियम प्रचुर में पाया जाता है जो ह्रदय को स्वस्थ रखते हुए हार्ट के विभिन्य परेशानियों से बचाता है।

लीची कैंसर को रोकता है: 
इसमें कैंसर रोधी बायो-केमिकल पदार्थ पाये जाते हैं जो कैंसर कोशिकाओं को पनपने से रोकता है। इसलिए कहा जाता है कि खासकर महिलाओं को इस फल का सेवन नियमित रूप से करना चाहिए ताकि स्तन कैंसर की संभावना कम हो।

लीची एसिडिटी कम करता है:
 लीची में फाइबर की बहुलता होती है जो आपके पाचन को सामान्य बनाए रखने में मदद करता है तथा कब्ज, जलन और अनपच जैसी समस्याओं से बचाता है।

लीची के पोषण तत्व:
लीची में कार्बोहायड्रेट, विटामिन सी, विटामिन

क्या आप जानते हैं कि श्मशान से आने के बाद नहाते क्यों हैं,


जानें इसके वैज्ञानिक और धार्मिक कारण को!

आप तो जानते ही होंगे कि इस पृथ्वी पर जिसने भी जन्म लिया है, उसे एक दिन मरना ही है। कोई भी कैसा ही क्यों ना हो हो उसे मरना ही होता है। आपने देखा होगा जब किसी की मृत्यु हो जाती है तो उसके शव को घर से श्मशान तक ले जाया जाता है। इस दौरान उसकी शव यात्रा में काफी लोग इकठ्ठा होते हैं। किसी के शव को कन्धा देने व उसकी शवयात्रा में शामिल होने को सभी धर्मों में पवित्र माना गया है। उसी समय इंसान को जीवन की सच्चाई का आभास होता है।

शवयात्रा में भाग लेने वाले सभी लोग करते हैं स्नान:
आपने एक और चीज देखी होगी कि जो लोग भी इस शवयात्रा में शामिल होते हैं, सभी स्नान करते हैं। बहुत सारे तो उनमें से ऐसे होते हैं, जिन्हें इसके कारणों के बारे में भी पता नहीं होता है। क्या आप भी उन्ही में से हैं, जिन्हें श्मशान के बाद नहाने की वजह नहीं पता है तो जानिए अंतिम संस्कार के बाद स्नान करने के धार्मिक और वैज्ञानिक कारण क्या हैं।

अंतिम संस्कार के बाद स्नान के धार्मिक कारण:
श्मशान से आने के बाद नहाने का धार्मिक कारण यह है कि श्मशान एक ऐसी जगह होती है जहाँ पर नकारात्मक शक्तियों का वास होता है। यह कमजोर दिल वाले व्यक्ति पर बहुत जल्द अपना कब्ज़ा कर लेती हैं। आपको बता दें पुरुषों की अपेक्षा महिलायें ज्यादा भावुक और मानसिक रूप से कमजोर होती हैं, इसलिए उन्हें श्मशान जाने की इजाजत नहीं होती है। ऐसा माना जाता है कि अंतिम किया हो जाने के बाद भी मृतआत्मा का सूक्ष्म शरीर कुछ समय तक वहाँ मौजूद रहता है। जो किसी पर भी बुरे प्रभाव डालने की शक्ति रखती है।

अंतिम संस्कार के बाद स्नान के वैज्ञानिक कारण:
अंतिम संस्कार के बाद स्नान करने के पीछे वैज्ञानिक कारण भी है। अंतिम संस्कार से पहले ही शव काफी देर तक बाहर रहता है, 

बिना मेहनत करे पेट की चर्बी कम करने के तरीके, ऎसा करने से 1 माह में मोटापा कम होने लगेगा।


चाय में पुदीना डालकर पीने से मोटापा कम होता है।

खाने के साथ टमाटर और प्याज का सलाद कालीमिर्च व नमक छिड़क कर खाएं। इससे आपको विटामिन सी, विटामिन ए, विटामिन के, आयरन, पोटैशियम, लाइकोपीन और ल्यूटिन एक साथ मिलेंगे।

रोज पपीता खाएं। लंबे समय तक पपीता के सेवन से कमर एक्ट्रा फेट्स कम होती है।

दही का सेवन करने से शरीर की एक्ट्रा फेट्स घटती है।

छोटी पीपल का बारीक चूर्ण कर उसे कपड़े से छान लें। इस चूर्ण को रोजाना तीन ग्राममात्रा में
सुबह के समय छाछ के साथ लें। इससे निकला हुआ पेट अंदर हो जाता है और कमर पतली हो जाती है।

पत्तागोभी में चर्बी घटाने के गुण होते हैं। इससे शरीर का मेटाबॉलिज्म सही रहता है।

सुबह उठते ही 250 ग्राम टमाटर का रस 2-3 महीने तक पीने से वसा में कमी होती है।
एक चम्मच पुदीना रस और 2 चम्मच शहद मिलाकर लें। इससे मोटापा कम होता है।

अगर मोटापा कम नहीं हो रहा है, तो खाने में कटी हुई हरी मिर्च या काली मिर्च को शामिल करके वजन को काबू में किया जा सकता है। एक रिसर्च में पाया गया कि वजन कम करने का सबसे बेहतरीन तरीका मिर्च खाना है।

मिर्च में पाए जाने वाले तत्व कैप्साइसिन से जलन पैदा होती है, जो भूख कम करती है।
इससे ऊर्जा की खपत भी बढ़ जाती है, जिससे वजन कंट्रोल में रहता है।

 दो बड़े चम्मच मूली के रस में शहद मिलाएं। इसमें बराबर मात्रा में पानी मिलाएं और पिएं। ऎसा करने से 1 माह के बाद मोटापा कम होने लगेगा।

 रोज सुबह-सुबह एक गिलास ठंडे पानी में दोचम्मच शहद मिला कर लीजिए। इस घोल को पीने से
शरीर से वसा की मात्रा कम होती है।

ज्यादा कार्बोहाइड्रेट वाली वस्तुओं से परहेज करें। शक्कर, आलू और चावल में अधिक कार्बोहाइड्रेट होता है। ये चर्बी बढ़ाते हैं।

केवल गेहूं के आटे की रोटी की बजाय गेहूं, सोयाबीन और चने के मिश्रित आटे की रोटी ज्यादा फायदेमंद है।

उत्कटासन योग विधि करिये योग रहिये निरोग.. Utkatasana Yoga

यहां पर आपको उत्कटासन के सरल तरीके के बारे में बताया जा रहा है जिसका अनुसरण करके आप इस आसन का अभ्यास अच्छी तरह से कर सकते हैं।

पैर को थोड़ा दूर रखकर और रीढ़ एवं सिर को सीधा रखते हुए बैठ जाएं।

सांस खींचते हुए पंजों पर बैठकर अच्छी तरह से दोनों एडि़यों को उठाएं।

दोनों कोहनियों को घुटनों पर रखें।
एक हाथ को दूसरे पर रखकर इसको अपनी ठोड़ी पर टिका दें।
सांस छोड़ते हुए नितंबों को एडि़यों पर टिकाएं।

धीरे धीरे सांस लें और धीरे धीरे सांस छोड़े और साथ ही साथ इसी स्थिति में बने रहें।

स्थिति में बने रहने की अवधि आप पर निर्भर करता है। धीरे धीरे आप इस अवधि को बढ़ाते रहें।

फिर धीरे-धीरे आरंभिक अवस्था़ में लौट आएं।
यह एक चक्र हुआ। इस तरह से आप तीन से पांच चक्र करें

उत्कटासन योग लाभ I Utkatasana benefits
उत्कटासन पंजों को मजबूत करने में बड़ी भूमिका निभाता है।
यह जांघों को स्वस्थ रखता है।
घुटनों को शक्ति प्रदान करता है।
इस तरह से आपके पैरों को मजबूत बनाता है और चलने फिरने में मदद करता है।

पाचन तंत्र की सक्रियता बढ़ाने में मदद करता है।

गठिया रोग में इसका अभ्यास करने से फायदा मिलता है।

यह रीढ़ की हड्डी के लिए लाभदायक है।

छाती के मांसपेशियों को मजबूत बनाता है।

पीठ के निचले हिस्से को स्वस्थ एवं मज़बूती प्रदान करता है |

शरीर में संतुलन बनाने में सहायक है।

इस आसन का अभ्यास से शरीर में स्फूर्ति बनी रहती है।

इसका नियमित अभ्यास से भूख खूब लगती है।

यह आसन स्त्रियों के लिए एक अलग मकाम रखता है।

कब्ज को कम कर गैस समस्या को रोकता है।

इस आसन के अभ्यास से आप पथरी एवं हर्निया से बच सकते हैं।
इसके नियमित अभ्यास से वीर्य का प्रभाव सही तरीके से होने लगता है और पुरुष इसको बहुत देर तक रोक सकते हैं।

जिनको पाइल्स की समस्या है उनको प्रायः इस आसन का अभ्यास करनी चाहिए।
इसके अभ्यास से वायुदोष को ठीक करने में मदद मिलती है।

उत्कटासन योग सावधानी I Utkatasana precaution
गंभीर गठिया रोग होने से इसको करने से बचें।

चककर आने पर इस अभ्यास को करने से बचें।

टखने में चोट होने पर यह आसन नहीं करना चाहिए।

घुटने का दर्द होने पर इसका अभ्यास न करें।

सिर दर्द और अनिद्रा की स्थिति में कुर्सी आसन का अभ्यास ना करें।
मासिक धर्म के दौरान इस आसन के अभ्यास में विशेष ध्यान रखें।

इसको खाली पेट अभ्यास करनी चाहिए।

ह्रदय रोग वाले इसको किसी विशेषज्ञ के निगरानी में करनी चाहिए।

सिर्फ सात दिन में बवासीर की छुट्टी, आजमाकर देख लीजिये


 यह नुस्खा एक महात्मा से प्राप्त हुआ और मरीजो पर प्रयोग करने पर 100 में से 90 मरीज लाभान्वित हुए यानि कि 90 प्रतिशत सफल है तो आइये जाने आप उस नुस्खे के बारे में।

औषिधि बनाने की विधि :
अरीठे या रीठा (Soap nut) के फल में से बीज निकाल कर शेष भाग को लोहे की कढाई में डालकर आंच पर तब तक चढ़ाए रखे जब तक वह कोयला न बन जाए जब वह जल कर कोयले की तरह हो जाए तब आंच पर से उतार कर सामान मात्रा में पपडिया कत्था मिलाकर कपडछन (सूती कपडे से छान कर) चूर्ण कर ले बस अब ये औषिधि तैयार है।

औषिधि सेवन करने का तरीका :
इस तैयार औषिधि में से एक रत्ती (125मिलीग्राम ) लेकर मक्खन या मलाई के साथ सुबह-शाम लेते रहे, इस प्रकार सात दिन तक दवाई लेनी होती है।

इस औषिधि के मात्र सात दिन तक लेते रहने से ही कब्ज, बवासीर की खुजली, बवासीर से खून बहना आदि दूर होकर मरीज को राहत महसूस करने लगता है

यदि मरीज इस रोग के लिए सदा के लिए छुटकारा पाना चाहे तो उन्हें हर छ: महीने के बाद फिर से 7 दिन का यह कोर्स बिलकुल इसी प्रकार दोहरा लेना चाहिए।

औषिधि सेवन के दौरान परहेज़ :
ध्यान रखे की औषिधि लेते समय सात दिन नमक का सेवन बिलकुल नहीं करना है ।
देशी इलाज में पथ्यापथ्य का विशेष ध्यान रखा जाता है कई रोगों में तो दवाई से ज्यादा तो पथ्य आहार जादा कारगर होता है

औषिधि सेवन के दौरान क्या-क्या खाएं :
मुंग या चने की दाल, कुल्थी की दाल, पुराने चावलों का भात, सांठी चावल, बथुआ, परवल, तोरई, करेला, कच्चा पपीता, गुड, दूध, घी, मक्खन, काला नमक, सरसों का तेल, पका बेल, सोंठ आदि पथ्य है। रोगी को दवा सेवन काल में इसका ही सेवन करना चाहिए।

औषिधि सेवन के दौरान क्या-क्या न खाएं :
उड़द, धी, सेम, भारी तथा भुने पदार्थ, घिया, धूप या ताप, अपानुवायु को रोकना, साइकिल की सवारी, सहवास, कड़े आसन पर बैठना आदि ये सभी बवासीर के लिए हानिकारक है।

घाव कितना भी गहरा हो... नामोनिशान मिटा देंगे ये देशी नुस्खे



यह कांटों से भरा हुआ, लगभग 2-3 फीट ऊंचा और वर्षाकाल तथा शीतकाल में पोखरों, तलैयों और खाइयों के किनारे लगा पाया जाने वाला पौधा होता है। इसका फूल पीला और पांच-सात पंखुड़ी वाला होता है। इसके बीज राई जैसे और संख्या में अनेक होते हैं। इसके पत्तों व फूलों से पीले रंग का दूध निकलता है, इसलिए इसे 'स्वर्णक्षीरी' यानी सुनहरे रंग के दूध वाली कहते हैं।
इसकी जड़, बीज, दूध और तेल को उपयोग में लिया जाता है। इसका प्रमुख योग 'स्वर्णक्षीरी तेल' के नाम से बनाया जाता है। यह तेल सत्यानाशी के पंचांग (सम्पूर्ण पौधे) से ही बनाया जाता है। इस तेल की यह विशेषता है कि यह किसी भी प्रकार के व्रण (घाव) को भरकर ठीक कर देता है।
व्रणकुठार तेल बनाये :-

निर्माण विधि :-
आप इस पौधे को सावधानीपूर्वक कांटों से बचाव करते हुए, जड़ समेत उखाड़ लाएं। इसे पानी में धोकर साफ करके कुचल कर इसका रस निकाल लें। फिर जितना रस हो, उससे चौथाई भाग अच्छा शुद्ध सरसों का तेल मिला लें और मंदी आंच पर रखकर पकाएं। जब रस जल जाए, सिर्फ तेल बचे तब उतारकर ठंडा कर लें और शीशी में भर लें। यह व्रणकुठार तेल है। जेसे अगर 200 ग्राम रस है तो 50 ग्राम ही शुद्ध घानी का सरसों का तेल डाले और पक के वापस 50 ग्राम तेल बचे तो रख ले .

प्रयोग विधि : -
किसी भी प्रकार के जख्म (घाव) को नीम के पानी से धोकर साफ कर लें। साफ रूई को तेल में डुबोकर तेल घाव पर लगाएं। यदि घाव बड़ा हो, बहुत पुराना हो तो रूई को घाव पर रखकर पट्टी बांध दें। कुछ दिनों में घाव भर कर ठीक हो जाएगा।ये घाव ठीक करने की अचूक दवा है अगर पुराना नासूर है तो भी ये दवा उतनी ही कारगर है .

जानिए कितने खतरनाक है टांग व बांह पर उभरी हुई नीली नसें? आखिर क्यों दिखती है ये उभरी हुई नसें?


आपने अक्सर देखा होगा कि कभी पैरों या टांगों में त्वचा के ऊपर मकड़ी के आकार की नीले रंग की उभरी हुई नसें दिखाई देती हैं। कभी यह पैरों या टांगों की अपेक्षा जांघों पर ज्यादा दिखाई देती हैं या फिर टखने के पास कभी ये नीली नसें पैरों या टांगों पर काफी बड़े आकार में हो जाती हैं।

कभी आपने गौर किया होगा आपके परिवार के सदस्यों की बांह पर नीली नसें ज्यादा मात्रा में उभरी हुई होंगी और साथ ही साथ हाथ में सूजन भी आती होगी। कभी आपने कुछ लोगों में विशेषत: छाती के ऊपरी हिस्से में और गर्दन के निचले हिस्से पर उभरी हुई नीली नसों का जमाव देखा होगा।    कुछ लोगों में उभरी हुई केंचुएनुमा बड़े आकार की नसें पेट के एक तरफ हिस्से पर या दोनों तरफ देखी होंगी। ये गुच्छेनुमा उभरी हुई नीली नसों का जमाव चाहे छाती या गर्दन पर हो, चाहे बांह या पेट पर हो, चाहे जांघों या फिर पैरों या टांगों पर हों, उसको सामान्य न समझकर गंभीरता से लें अन्यथा लापरवाही के कारण इसके परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। ये असामान्य तरीके से त्वचा पर दिखने वाली उभरी हुई नीली नसें शरीर के अंदर विभिन्न रोगों की ओर इशारा करती हैं। अत: शरीर के किसी भी अंग पर उभरी हुई नीली नसों को गंभीरता से लें और तुरंत किसी वैस्कुलर सर्जन से परामर्श लें।

आखिर क्यों दिखती है ये उभरी हुई नसें?
ये उभरी हुई नसें शरीर के ऊपरी सतह पर स्थित शिराओं यानी वेन्स का जाल है, जो सामान्य परिस्‍थितियों में त्वचा पर ज्यादा उभार नहीं लेती हैं और शरीर के अंदर स्थित मोटी-मोटी शिराओं वाले सिस्टम से जुड़ी रहती हैं। ऊपरी सतह में स्थित शिराओं का जाल ऊपरी सतह से अशुद्ध खून को इकट्ठा कर शरीर की गहराई में स्थित बड़ी शिराओं के सिस्टम में पहुंचाता है, जहां से सारा अशुद्ध खून इकट्ठा होकर दिल से होते हुए फेफड़े में शुद्धिकरण के लिए पहुंचता है। अगर किसी वजह से शरीर के अंदर गहराई में स्‍थित मोटी शिराओं के सिस्टम में रुकावट आ जाती है तो ये बाहरी सतह से आने वाले खून को स्वीकार नहीं कर पाता है जिससे अशुद्ध बजाय अंदर जाने के खाल के अंदरुनी सतह में समाहित रहता है जिससे खाल के नीचे स्थि‍त शिराओं के सिस्टम में अशुद्ध खून की मात्रा ज्यादा होने से ये नीली नसें खाल के ऊपर उभरकर बड़ी मात्रा में दिखाई देने लगती है।

आपकी बांह या हाथ में उभरी हुई नसों का कारण
अगर आपके शरीर में बांह या हाथ पर उभरी हुई नीली नसें अचानक दिखने लगी हों और बराबर हों तो इसका कारण हाथों से अशुद्ध खून इकट्ठा करने वाली वेन यानी शिरा में या तो खून के कतरे स्थायी रूप से जमा हो गए हैं या फिर गर्दन या कंधे के पास स्‍थित कोई ट्यूमर या कैंसर की गांठ उस पर बाहर से दबाव डाल रही है। कभी-कभी गर्दन या कंधे के पास स्थि‍त कैंसर वाले ट्यूमर की सिंकाई के दौरान भी सूजन के साथ नीली नसों के उभरने की आशंका हो सकती हैl

जांघों या टांगों में उभरी हुई नीली नसों का दिखना 
अगर आपकी जांघ में मकड़ी के जाले की तरह जगह-जगह नीली नसें उभरी हुई दिख रही हैं तो इसको सामान्य न समझें। इसको किसी वैस्क्युलर या कार्डियो वैस्क्युलर सर्जन को दिखाकर उनकी सलाह जरूर लें। इस तरह की उभरी हुई नीली नसों के दो कारण होते हैं- एक कारण क्रोनिक वीनस इन्सफीशियन्सी यानी सीवाआई का रोग है जिसमें वेन के अंदर स्थित कपाट यानी दरवाजे कमजोर पड़ जाते हैं। सामान्यत: इन शिराओं में स्थित कपाट अशुद्ध खून को एक ही दिशा में ऊपर चढ़ाने की अनुमति देते हैं जिससे टांगों में अशुद्ध खून की ज्यादा मात्रा इकट्ठा न हो पाए। ऊपर चढ़ा हुआ खून अगर वापस आने की कोशिश करता है तो ये कपाट आपस में बंद हो जाते हैं जिससे खून नीचे वापस नहीं आ पाता है। जब ये कपाट किन्हीं कारणों से बंद हो जाते हैं या इनकी संरचना में कोई गंभीर परिवर्तन हो जाता है तो ऊपर चढ़ने वाले खून का कुछ या ज्यादा हिस्सा इन कपाटों के कमजोर होने की वजह से ऊपर जाकर फिर ‍नीचे की ओर आ जाता है। ये वापस आने की क्रिया निरंतर दोहराए जाने पर अशुद्ध खून खाल के नीचे स्थित शिराओं में इकट्ठा होना शुरू हो जाता है जिससे खाल पर नीली नसों का उभार दिखने लगता है। ये शिराओं में स्थित कपाट लोगों में प्रतिदिन नियमित न चलना व व्यायाम का अभाव होने से कमजोर पड़ जाते हैं और अपना कार्य सुचारु रूप से नहीं कर पाते। कपाटों की संरचना में परिवर्तन नसों में खून के कतरे कुछ समय के लिए इकट्ठा होने की वजह से आंशिक रूप से नष्ट हो जाते हैं जिससे वे आपस में ठीक से बंद नहीं हो पाते जिससे ऊपर चढ़ा हुआ अशुद्ध खून नीचे आना शुरू हो जाता है और खाल के नीचे उभरी हुई नस दिखने लगती है।
  इसका कोई भी संभावित या पर्टीकूलर इलाज उपलब्ध नहीं है प्रेशर बैंडेज बांधकर इसको कुछ हद तक रोका जा सकता है

  इसके इलावा एप्पल साइडर सिरका इस में काफी हद तक लाभकारी हो सकता है एप्पल साइडर सिरके से हल्की की मालिश करनी चाहिए और दो दो चम्मच दिन में दो बार लेना चाहिए पानी में डालकर एसिडिटी के मरीजों को एप्पल साइडर सिरके का प्रयोग नहीं करना चाहिए अगर करना भी जरुरी हो तो एसिडिटी की दवाइयां साथ में लेते रहे

एक देशी ईलाज उपयोग करके देखिए इसे 
सर्दियों में तीखी मूली का रस निकाल कर उसमें आटा भिगोकर रोटी बनाइए रोटी मोटी मोटी हो। फिर उस रोटी को और मूली का रस ले कर उसमें डाल कर चूरमें की तरह से कर लें जो चुरमा बने उसे वेरिकोस वैनस पर लगा कर ऊपर से कपड़ा बाँध कर रात भर रखें सवेरे उतारे ऐसा एक महीने तक करने से बहुत लाभ मिलता है। थोड़ी खुजली हो तो समझे के आप की बीमारी ठीक हो रही है पर खुजलाये ना। 

5 मिनट में 😷😷😷 को कुवारी लड़की के जैसी टाइट करें, अपनाए ये घरेलु उपाए


5 मिनट में योनि को कुवारी लड़की के जैसी टाइट करें, अपनाए ये घरेलु उपाए

दोस्तों स्वागत है आपका एक बार फिर से सेक्स और हेल्थ से सम्बंधित इस वेबसाइट पर दोस्तों सबसे पहले तो हम आपका बता दें की अगर आप किसी भी प्रकार की समस्या से पीड़ित हों तो आप हमे लिख सकते है आज का हमारा टॉपिक है की लड़की की ढीली योनि को टाइट कैसे करें जी हाँ इस पोस्ट में में आप जानेंगे कुछ घरेलु नुस्खे जिनकी सहायता से आपकी पार्टनर की योनि टाइट हो जाएगी और आपको सम्भोग का असली आनंद आएगा

अधिक`सहवास करने, सम्भोग करते समय गलत तरीके इस्तेमाल करने, अति प्रसव करने और शरीर के कमजोर एवं शिथिल होने के कारण स्त्रियों का योनि मार्ग ढीला हो जाता है, जिससे सहवास करते समय सुख एवं आनन्द की अनुभूति नहीं होती।
ऐसी स्थिति में प्रायः पति लोग सहवास क्रिया में रुचि नहीं ले पाते और कोई-कोई पति परायी स्त्रियों की ओर आकर्षित हो जाते हैं। विलासी एवं रसिक स्वभाव के पति घर की सुन्दर नौकरानियों से ही यौन संबंध कायम कर लेते हैं। इस परिस्थिति से बचने के लिए यहाँ हम कुछ उपाय बताने जा रहे है जिनकी सहायता से आप अपनी योनि को टाइट कर सकती है

तो दोस्तों हम अपने टॉपिक पर आते है की कैसे आप किसी भी लड़की की योनि को टाइट कर सकते है
भांग को सुखाकर कूट-पीसकर महीन चूर्ण कर लें। इस चूर्ण को 5-6 ग्राम (एक छोटा चम्मचभर) मात्रा में, एक महीन मलमल के साफ सफेद कपड़े पर रखकर छोटी सी पोटली बनाकर मजबूत धागे से बांध दें। धागा लम्बा रखें, ताकि धागे को खींचकर पोटली बाहर खींची जा सके। रात को सोते समय इस पोटली को पानी में डुबोकर गीली कर लें एवं योनि मार्ग में अन्दर तक सरकाकर रख लें और सुबह निकालकर फेंक दें। लाभ न होने तक यह प्रयोग जारी रखें।
2.  माजूफल का चूर्ण 100 ग्राम मोचरस का चूर्ण 50 ग्राम और लाल फिटकरी 25 ग्राम। सबको कूट-पीसकर मिलाकर रखें। अब 20 ग्राम खड़े मूंग 3 कप पानी में खूब उबालें और बाद में छानकर इस पानी को ठंडा कर लें एक रूई का बड़ा फाहा इस पानी में गीला कर निचोड़ लें और इस पर ऊपर बताया चूर्ण बुरककर यह फाहा सोते समय योनि में रखें। इन दोनों में से कोई एक प्रयोग कुछ दिन तक करने से योनि तंग और सुदृढ़ हो जाती है।

हडजोड़ – बढ़ती उम्र में हड्डियों का रक्षक



हडजोड़ या अस्थिसंधानक (वानस्पतिक नाम : Cissus quadrangularis) को आयुर्वेद में  हड्डियों के स्वास्थ्य के लिये रामबाण बताया गया है.

हड्डियों के लिये हडजोड की उपयोगिता इसमें उपलब्ध एनाबोलिक होर्मोंस (Anabolic hormones) के कारण होती है क्योकि ये होर्मोंस ही रक्त के कैल्शियम को हड्डियों तक पहुंचाने का कार्य करते हैं.

एनाबोलिक होर्मोंस हमारे शरीर में ही बनते हैं लेकिन उम्र के बढ़ाव के साथ इनकी उत्पत्ति कम होती जाती है. परिणामस्वरूप, कैल्शियम भी ठीक प्रकार से हड्डियों में नहीं पहुँच पाता और हमारी हड्डियाँ पोली, झरझरी और कमज़ोर होने लगती हैं.  इसी विसंगति को ऑस्टियोपोरोसिस (osteoporosis) रोग कहा जाता है.
Osteoporosis के चलते अकारण फ्रैक्चर होने लगते हैं जिन्हें ठीक होने में  सामान्य से अधिक समय लगने लगता है.

ऑस्टियोपोरोसिस की  समस्या पुरुषों की अपेक्षा प्रौड़ महिलाओं में अधिक पाई जाती है. ये इस कारण, क्योंकि बढ़ती आयु में Menopause अथवा मासिक धर्म बंद होने के कारण कई hormonal बदलाव आते हैं जिनके कारण कैल्शियम का अवशोषण कम हो जाता है.

ये अलग बात है कि जब तक महिलाओं की मासिक धर्म क्रिया चलती रहती है, उनकी कैल्शियम अवशोषण प्रणाली पुरुषों से लगभग डेढ़ गुना अधिक रहती है.
हडजोड की पहचान
हड़जोड़ को अस्थि श्रृंखला के नाम से भी जाना जाता है। यह एक बेल है जिसमें हर चार से छह इंच के खंडाकार (Blocks) बाद एक जोड़ वाली गांठ रहती है. नाम अनुरूप ये मानव की बाँहों या जांघों की हड्डियों का भान कराती है।

हर गांठ से एक अलग पौधा पनप सकता है। चतुष्कोणीय (Quadrangular) तने में हृदय (Heart)के आकार वाली पत्तियां होती है। छोटे फूल लगते हैं। पत्तियां छोटी-छोटी होती है और लाल रंग के मटर के दाने के बराबर फल लगते हैं। यह बरसात में फूलती है और जाड़े में फल आते हैं.

दक्षिण भारत और श्रीलंका में इसके तने को साग व चटनी के रूप में प्रयोग करते हैं। इसकी सब्जी भी बनाई जाती है.

आदिवासी बहुल मध्यप्रदेश व छत्तीसगढ़ के हिस्सों में इसको पीस कर उड़द या मूग मिलाकर बड़ियाँ  भी बनाई जाती हैं.

कैसे करें उपयोग
कृपया ध्यान रखें, हडजोड को कभी भी कच्चा न खाएं. कच्चे हडजोड का स्वाद कच्ची अरबी या कटहल जैसा तेज़ होता है, जिससे मुहं में जलन, छाले हो सकते हैं. हडजोड का उपयोग हमेशा उबालकर या तलकर ही करें.

500 ग्राम ताज़ी या 100 ग्राम सूखी वनस्पति से एक लीटर काढ़ा तैयार करें.  इस काढ़े की 30 से 50 मिलीलीटर तक की मात्रा दिन में दो बार ली जा सकती है.
हडजोड को अन्य long fried या long pressure cooked व्यंजनों जैसे, राजमाह, चना या करेले, कटहल, जिमीकंद इत्यादि में भी मिलाया जा सकता है.

सारशब्द
हडजोड बढ़ती उम्र के रोगों जैसे ऑस्टियोपोरोसिस, आर्थराइटिस, उच्च रक्तचाप, जोड़ों व शरीर के दर्द व कोलेस्ट्रॉल नियंत्रण में लाभकारी है. इसका नियमित उपयोग हमें महगी चिकित्सा से बचा सकता है.